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विद्याध्ययन आवश्यक क्यों?
भारतीय शास्त्रकारो ने विद्या विहीन मनुष्य की तुलना पशु से की हैं। विद्या एवं ज्ञान ही मनुष्य की विशेषता हैं। पशुओं की तुलना में मनुष्य में ज्ञान शक्ति के कारण कुछ विशेषता हैं। परंतु अज्ञानी मनुष्य का जीवन निश्चय रुप से ही पशुओं से गया-गुजरा हैं। अज्ञानी मनुष्य को अपने जीवन में किसी दिशा में प्रगति करने का अवसर नहीं मिलता हैं।
व्यक्ति अपने जीवन निर्वाह की महत्वपूर्ण आवश्यकता भी कठिनाई से पूरी कर पाता हैं। उसे अनेक अभावों, असुविधा और आपत्तियों से भरी जिन्दगी जीनी पड़ सकती हैं। जिस व्यक्ति में ज्ञान की कमी होती हैं, उसको जीवन के हर क्षेत्र में सर्वत्र अभाव होते रहते हैं। व्यक्ति की उचित प्रगति के सभी रास्ते उसे बंध से प्रतित होते हैं।
कोई भी मनुष्य अपने जीवन में विद्या से विहीन एवं अज्ञानी न रहें। इसलिए हमारे विद्वान ऋषीमुनीयों ने प्राचिन काल से ही हर व्यक्ति के लिये उपयोगी विद्या प्राप्त करने की आवश्यकता एवं अनिवार्य बताई है।
मनुष्य को प्राप्त होने वाली विद्या उसके ज्ञान का मुख्य आधार हैं। इसलिये जिस व्यक्ति को विद्या नहीं आती उसे ज्ञान प्राप्ति से वंचित रहना पड़ता हैं।
हमारे शास्त्रो के अनुशार व्यक्ति को जीवन में कष्ट और क्लेशों से छुटकारा केवल ज्ञान से ही मिल सकता है। क्योकी अज्ञानी मनुष्य तो जटिल बंधनो में ही बँधा रहता हैं। उन बंधनो से बाहर निकलने का उचित प्रयास नहीं कर पाता और उसका मन, शरीर के बंधनो में पड़े हुए बंदी की भांति कष्ट भोगने पड़ते हैं। व्यक्ति ज्ञान के अभाव के कारण कष्टो को सहता ही रहता हैं और उसे अंधकार में भटकना ही पड़ता हैं, व्यक्ति को सही मार्ग ज्ञान प्रकाश की प्राप्ति होने पर ही मिलता हैं।
सृष्टी के हर पशु-पक्षि-प्राणी को खाने, सोने, बच्चे करने आदि शारीरिक प्रवृतियों को करने का ज्ञान प्रकृति द्वारा प्राप्त हैं। इन प्रवृति या क्रियाओं के करने से किसी को ज्ञानी नहीं कहा जा सकता उसे अज्ञानी ही कहा जाएगा। क्योकि हर देहधारी जीव में सांस लेने, आहार पचाने, जमाने और खर्चने की प्रमुख जानकारियाँ किसी ना किसी रूप में स्वतः ही बिना प्रयास के ही मिली हुई होती हैं। जो जीव इतना ही जानते हैं। वस्तुतः वे देहीक कियाओं की जानकारी तक ही सीमित हैं। ज्ञान वह हैं, जिस्से मनुष्यने अब तक संशोधन, परिवर्तन द्वारा उपलब्धियों को प्राप्त कर मानव ने समग्र विश्व का विकास किया हैं, यह विकसिता ही मनुष्य का ज्ञान हैं।
 
शिक्षण से व्यक्तित्व का विकास होता हैं।
जीवन में व्यक्ति को स्वाभाविक संस्कार एवं वंश परम्परा से चतुरता तो एक सीमा तक मिली हुई हैं, परंतु व्यक्ति का विकास उसके प्रयत्नों से ही संभव होता हैं। ज्ञान के बीज इश्वरीय कृपा से मानवीय चेतना में बचपन से ही विद्यमान हो जाते हैं। परंतु उस ज्ञान का विकास हर व्यक्ति नहीं कर पाता हैं। उसका विकार व्यक्ति के आस-पास की अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितीयों के आधार पर होता हैं। विद्वानो के मत से बिना दूसरों से कुछ सिखे मनुष्य की बुद्धिमत्ता किसी काम की नहीं हैं।
जैसे किसी छोटे बच्चे को जिन परिस्थितियों में रहना पड़ता हैं, बच्चा उसी प्रकार परिस्थितियों के अनुरुप ढल जाता है।
जेसे किसी अज्ञानी के बच्चे और पढे-लिखे सुसंस्कृत के बच्चे में जो अन्तर देखा जाता हैं, वह अंतर बच्चे में जन्मजात नहीं होता वह अंतर परीस्थिती, वातावरण और संगति के प्रभाव से होता है।
जिस व्यक्ति को जीवन में उपयुक्त सुविधायें प्राप्त हो जाती हैं, वह व्यक्ति सुविकसित जीवन जीने की परिस्थियाँ प्राप्त कर लेता हैं। उसी प्रकार जिस व्यक्ति को जीवन में उपयुक्त सुविधा से वंचित रहना पड़ता हैं, वह लोग मानसिक दृष्टि से गई-गुजरी दशा में रह जाते हैं। इस लिये जो व्यक्ति को नीम्न परिस्थियों में पड़ा नहीं रहना है, उन के लिये विद्या अध्ययन करके अपने जीवन में उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ना संभव हो सकता हैं।
दैनिक दिनचर्या, कुंटुंब एवं सामाजिक परिवेश के संपर्क में रहकर जो सीख, जो ज्ञान प्राप्त होता हैं वह मनुष्य के विकास हेतु नाकाफि हैं अथवा प्राप्त होने वाला ज्ञान सीमित दायरे के कारण बहुत थोड़ा होता हैं। उस थोडे ज्ञान से व्यक्ति के विकास का काम नहीं चल सकता। क्योकि विकास हेतु मनुष्य की अबतक की जो उपलब्धिया हैं, अबतक जिस विशाल ज्ञान का संग्रह किया हैं, उससे भी लाभ उठाना आवश्यक होता हैं। जो सीमित दायरे में या कुंटुंब या परिवेश में प्राप्त होना संभव नहीं हैं। व्यक्ति के विकास का एक ही उपाय हैं, विद्याध्ययन।
क्योकि व्यक्ति के द्वारा कमाया और जमा किया गया धन तो खर्च होता रहता हैं और कष्ट होते रहे हैं, लेकिन व्यक्ति के द्वारा उपार्जित ज्ञान सुरक्षित रहता हैं।
जेसे किसी व्यक्ति के पास तो अल्प ज्ञान होता है, जिससे पेट भरने की आवश्यकता की पूर्ति जा सकती हैं। इस लिये जीवन में विद्याध्ययन अति आवश्यक मानी गई हैं।

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