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ज्योतिष और विद्या विचार
 
हर माता-पिता की कामना होती है कि उनका बच्चें परीक्षा में उच्च अंकों से उत्तीर्ण हो एवं उसे सफलता मिले। उच्च अंकों का प्रयास तो सभी बच्चें करते हैं पर कुछ बच्चें असफल भी रह जाते हैं। कई बच्चों की समस्या होती है कि कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें अधिक याद नहीं रह पाता, वे कुछ जबाव भूल जाते हैं। जिस वजह से वे बच्चें परीक्षा में उच्च अंकों से उत्तीर्ण नहीं होपाते या असफल होजाते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुशार विद्या का विचार जन्म कुंडली में पंचम भाव से किया जाता हैं। विद्या एवं वाणी का निकटस्थ संबध होता हैं। अतः विद्या योग का विचार करने के लिए द्वितीय भाव भी सहायक होता हैं।
चन्द्र और बुध की स्थिति से विद्या प्राप्ति के लिये उपयोगी जातक का मानसिक संतुलन एवं मन की स्थिती का आंकलन किया जाता हैं। कई विद्वानो के अनुशार बुध तथा शुक्र की स्थिति से व्यक्ति की विद्वता एवं सोचने की शक्ति का विचार किया जाता है।
  • शास्त्रो के अनुशार बुध विद्या, बुद्धि और ज्ञान का स्वामी ग्रह हैं, इस लिये 12 वर्ष से 24 वर्ष की उम्र विद्याध्ययन की होती है, चाहे वह किसी प्रकार की विद्या हो, इस अविध को बुध का दशा काल माना जाता हैं।
  • जातक में विद्या की स्थिरता, अस्थिरता एवं विकास का आंकलन बृहस्पति (गुरु) से किया जाता हैं।
  • विदेशी भाषा एवं शिक्षा का विचार शनि की स्थिति से किया जाता हैं।
  • ज्योतिष के अनुशार असफलता का कारण बच्चें की जन्मकुंडली में चंद्रमा और बुध का अशुभ प्रभाव है।
चंद्रमा और बुध का संबंध विद्या से हैं, क्योकि मन-मस्तिष्क का कारक चंद्रमा है, और जब चंद्र अशुभ हो तो चंचलता लिए होता है तो मन-मस्तिष्क में स्थिरता या संतुलन नहीं रहता हैं, एवं बुध की अशुभता की वजह से बच्चें में तर्क व कुशाग्रता की कमी आती है। इस वजह से बच्चें का मन पढाई मे कम लगता हैं और अच्छे अंकों से बच्चा उत्तीर्ण नहीं हो पाता।
 
भारतीय ऋषि मुनिओं ने विद्या का संबंध विद्या की देवी सरस्वती से बताय हैं। तो जिस बच्चें की जन्मकुंडली में चंद्रमा और बुध का अशुभ प्रभावो हो उसे विद्या की देवी सरस्वती की कृपा भी नहीं होती। एसे मे मां सरस्वती को प्रसन्न कर उनकी कृपा प्राप्त चंद्रमा और बुध ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम कर शुभता प्राप्त की जा सकती है।
मां सरस्वती को प्रसन्न कर उनकी कृपा प्राप्त करने का तत्पर्य यह कतई ना समजे की सिर्फ मां की पूजा-अर्चना करने से बच्चा परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो एवं उसे सफलता मिल जायेगी क्योकि मां सरस्वती उन्हीं बच्चों की मदद करती हैं, जो बच्चे मेहनत मे विश्वास करेते और मेहनत करते हैं। बिना मेहनत से कोइ मंत्र-तंत्र-यंत्र परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने मे सहायता नहीं करता है। मंत्र-तंत्र-यंत्र के प्रयोग से एक तरह की सकारत्मक सोच उत्पन्न होती है जो बच्चें को पढाई मे उस्की स्मरण शक्ती का विकास करती हैं।
• जन्म कुंडली में यदि बुध स्वग्रही, मित्रग्रही, उच्चस्थ हो या शुभ ग्रहो से द्रष्ट हो तो जातक की लिखावट एवं लेखन कला उच्च कोटी कि होती हैं।
• जन्म कुंडली में पंचम भाव में यदि बृहस्पति (गुरु) अकेला स्थित हो तो जातक के विद्या प्राप्ति स्थाई या अस्थाई रुप से प्राभावित हो सकती हैं
• जन्म कुंडली में पंचम भाव में बुध एवं शुक्र की युति को भी विद्या प्राप्ति के लिये बाधन माना गया हैं।
• जन्म कुंडली में पंचम भाव का स्वामी 6,8 या 12 भाव में हो तो जातक की मध्य भाग कि माध्यमिक शिक्षा प्राभावित हो सकती हैं।
• जन्म कुंडली में बलवान शनि का प्रभाव भी परीक्षा में हमेशा माना गया हैं। इस योग में ज्यादातर बच्चे परीक्षा में असफल होते देखे गए हैं।

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