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शिवरात्रि पूजन विधान
महाशिवरात्रि के दिन शिवजी का पूजन अर्चन करने से उनकी कृपा सरलता से प्राप्त होति हैं, इस लिये शिवभक्त, शिवालय/शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर दूध, गंगाजल, बेल-पत्र, पुष्प आदि से अभिषेक कर, शिवजी का पूजन कर उपवास कर रात्रि जागरण कर भजन किर्तन करते हैं।
शास्त्रो मे वर्णन मिलता हैं की शिवरात्रि के दिन शिवजी की माता पर्वती से शादी हुई थी इसलिए रात्र के समय शिवजी की बारात निकाली जाती हैं।
शिवरात्रि का पर्व सृष्टि का सृजन कर्ता स्वयं परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की स्मृति दिलाता है। यहां ’रात्रि’ शब्द अज्ञान (अन्धकार) से होने वाले नैतिक कर्मो के पतन का द्योतक है। केवल परमात्मा ही ज्ञान के सागर हैं जो मनुष्य मात्र को सत्य ज्ञान द्वारा अन्धकार से प्रकाश की ओर अथवा असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं।
शिवरात्रि का व्रत सभी वर्ग एवं उम्र के लोग कर सकते हैं। इस व्रत के विधान में सुबह स्नान इत्यादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता हैं।
शिवरात्रि के दिन शिव मंदिर/शिवालय में जाकर शिव लिंग पर अपने कार्य उद्देश्य की पूर्ति के अनुरुप दूध, दही, गंगाजल, घी, मधु (मध,महु), चीनी (मिश्रि) बेल-पत्र, पुष्प आदि का शिव लिंग पर अभिषेक कर शिवलिंग पूजन का विधान हैं।
शिवलिंग पर अभिषेक का महत्व
अभिषक अर्थात स्नान कारना अथवा किसी निर्धारित पदार्थ से वस्तु विशेष पर अर्पण पदार्थ को डालना। शिवलिंग पर स्नान अथवा अभिषेक करना। अभिषेक में भी रुद्राभिषेक का विशेष महत्व हैं। रुद्राभिषेक में रुद्रमंत्रों के उच्चारण के साथ शिवलिंग पर अभिषेक किया जाता हैं।
रुद्राभिषेक को भगवान शिव की आराधना का सर्वश्रेष्ठ उपायो में से एक माना गया हैं। विद्वानो के मत से धर्म शास्त्रो में शिव को जलधारा से अभिषेक करना सर्वाधिक प्रिय माना जाता है। विद्वानो के अनुशार भारत के प्रमुख ग्रंथ ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में उल्लेखित मंत्रो का प्रयोग रुद्रमंत्रों के रुप में किया जाता हैं।

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