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,मां दुर्गा की उपासना क्यों की जाती हैं?
लेखसाभार:गुरुत्वज्योतिषपत्रिका (अक्टूबर-2011)
नमोदेव्यैमहादेव्यैशिवायैसततंनम:
नम: प्रकृत्यैभद्रायैनियता: प्रणता: स्मताम्॥
अर्थात: देवी देवी को नमस्कार हैं, महादेवी को नमस्कार हैं। महादेवी शिवा को सर्वदा नमस्कार हैं। प्रकृति एवं भद्रा को मेरा प्रणाम हैं। हम लोग नियमपूर्वक देवी जगदम्बा को नमस्कार करते हैं। Post By : GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH


उपरोक्त मंत्र से देवी दुर्गाकास्मरणकरप्रार्थनाकरनेमात्रसेदेवीप्रसन्नहोकरअपनेभक्तोंकीइच्छापूर्णकरतीहैं।समस्त देव गण जिनकी स्तुति प्राथना करते हैं। माँदुर्गाअपनेभक्तो कीरक्षाकरउन पर कृपा द्रष्टी वर्षाती हैं और उसको उन्नती के शिखर पर जाने का मार्ग प्रसस्त करती हैं। इस लिये ईश्वर में श्रद्धा विश्वार रखने वाले सभी मनुष्य को देवीकीशरणमेंजाकरदेवीसेनिर्मल हृदय से प्रार्थनाकरनी चाहिये।
देवीप्रपन्नार्तिहरेप्रसीद प्रसीदमातर्जगतोsखिलस्य।
पसीदविश्वेतरिपाहिविश्वं त्वमीश्चरीदेवीचराचरस्य।
अर्थात: शरणागतकिपीड़ादूरकरनेवालीदेवीआपहमपरप्रसन्नहों।संपूर्णजगतमाताप्रसन्नहों।विश्वेश्वरी देवी विश्वकिरक्षाकरो।देवी  आप हि एक मात्र चराचर जगतकिअधिश्वरीहो।Post By : GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH


सर्वमंगलमांगल्येशिवेसर्वार्थसाधिके
शरण्येत्रयम्बकेगौरिनारायणि  नमोऽस्तुते॥
सृष्टिस्थितिविनाशानांशक्तिभूतेसनातनि।
गुणाश्रयेगुणमयेनारायणिनमोऽस्तुते॥
अर्थात: हेदेवीनारायणी  आपसबप्रकारकामंगलप्रदानकरनेवालीमंगलमयीहो।कल्याण दायिनी शिवाहो।सबपुरूषार्थोंकोसिद्धकरनेवालीशरणा गतवत्सला तीननेत्रोंवालीगौरीहो, आपकोनमस्कारहैं।आपसृष्टिकापालनऔरसंहारकरने वाली शक्तिभूतासनातनीदेवी, आपगुणोंकाआधारतथासर्वगुणमयीहो।नारायणी देवी तुम्हेंनमस्कारहै।
इस मंत्र के जप से माँकि शरणागती प्राप्त होती हैं। जिस्से मनुष्य के जन्म-जन्म के पापोंकानाश होता है।मांजननीसृष्टिकि आदि, अंतऔरमध्यहैं।
देवीसेप्रार्थनाकरें
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे
सर्वस्यार्तिंहरेदेविनारायणिनमोऽस्तुते
अर्थात: शरणमेंआएहुएदीनोंएवंपीडि़तोंकीरक्षामेंसंलग्नरहनेवालीतथासबकिपीड़ादूरकरनेवालीनारायणीदेवीआपको नमस्कारहै।
रोगानशेषानपहंसितुष्टा रूष्टातुकामानसकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानांविपन्नराणां त्वामाश्रिताहाश्रयतांप्रयान्ति।
अर्थातः देवी आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके है। उनको विपत्ति आती ही नहीं। तुम्हारी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं।st By : GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH


सर्वबाधाप्रशमनंत्रेलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेवत्वयाकार्यमस्यध्दैरिविनाशनम्।
अर्थातःहेसर्वेश्वरीआपतीनोंलोकोंकिसमस्तबाधाओंकोशांतकरोऔरहमारेसभी शत्रुओंकानाशकरतीरहो।
Post By : GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH 
शांतिकर्मणिसर्वत्रतथादु:स्वप्रदर्शने।
ग्रहपीडासुचोग्रासुमहात्मयंशणुयात्मम।
अर्थातःसर्वत्रशांतिकर्ममें, बुरेस्वप्नदिखाईदेनेपरतथाग्रह जनित पीड़ाउपस्थितहोनेपरमाहात्म्यश्रवणकरनाचाहिए।इससेसबपीड़ाएँशांतऔरदूरहोजातीहैं।
यहि कारण हैं सहस्त्रयुगों से मां भगवती जगतजननी दुर्गा की उपासना प्रति वर्ष वसंत, आश्विन एवं गुप्त नवरात्री में विशेष रुप से करने का विधान हिन्दु धर्म ग्रंथो में हैं।Post By : GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH


>> गुरुत्वज्योतिष पत्रिका (अक्टूबर –2011)

OCT-2011

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