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ऋण मोचन महा गणपति स्तोत्र

 लेखसाभार:गुरुत्वज्योतिषपत्रिका (सितम्बर-2011)
विनियोगः ॐ अस्य श्रीऋण मोचन महा गणपति स्तोत्र मन्त्रस्य भगवान् शुक्राचार्य
ऋषिः
, ऋणमोचनगणपतिः देवता, ममऋणमोचनार्थं जपे विनियोगः।

 

ऋष्यादि-न्यासः- भगवान् शुक्राचार्य ऋषये नमः शिरसि, ऋणमोचनगणपति देवतायै नमः
हृदि
, ममऋणमोचनार्थे जपे विनियोगाय नमः अञ्जलौ।

॥मूलस्तोत्र॥

ॐस्मरामिदेव-देवेश! वक्र-तुणडंमहा-बलम्।षडक्षरंकृपा-सिन्धु, नमामिऋण-मुक्तये॥१॥
महा-गणपतिंदेवं, महा-सत्त्वंमहा-बलम्।महा-विघ्न-हरंसौम्यं, नमामिऋण-मुक्तये॥२॥
एकाक्षरंएक-दन्तं, एक-ब्रह्मसनातनम्।एकमेवाद्वितीयंच, नमामिऋण-मुक्तये॥३॥
शुक्लाम्बरंशुक्ल-वर्णं, शुक्ल-गन्धानुलेपनम्।सर्व-शुक्ल-मयंदेवं, नमामिऋण-मुक्तये॥४॥
रक्ताम्बरंरक्त-वर्णं, रक्त-गन्धानुलेपनम्।रक्त-पुष्पैपूज्यमानं, नमामिऋण-मुक्तये॥५॥
कृष्णाम्बरंकृष्ण-वर्णं, कृष्ण-गन्धानुलेपनम्।कृष्ण-पुष्पैपूज्यमानं, नमामिऋण-मुक्तये॥६॥
पीताम्बरंपीत-वर्णं, पीत-गन्धानुलेपनम्।पीत-पुष्पैपूज्यमानं, नमामिऋण-मुक्तये॥७॥
नीलाम्बरंनील-वर्णं, नील-गन्धानुलेपनम्।नील-पुष्पैपूज्यमानं, नमामिऋण-मुक्तये॥८॥
धूम्राम्बरंधूम्र-वर्णं, धूम्र-गन्धानुलेपनम्।धूम्र-पुष्पैपूज्यमानं, नमामिऋण-मुक्तये॥९॥
सर्वाम्बरंसर्व-वर्णं, सर्व-गन्धानुलेपनम्।सर्व-पुष्पैपूज्यमानं, नमामिऋण-मुक्तये॥१०॥
भद्र-जातंचरुपंच, पाशांकुश-धरंशुभम्।सर्व-विघ्न-हरंदेवं, नमामिऋण-मुक्तये॥११॥
॥फलश्रुति॥
यःपठेत्ऋण-हरं-स्तोत्रं, प्रातः-कालेसुधीनरः।षण्मासाभ्यन्तरेचैव, ऋणच्छेदोभविष्यति॥
भावार्थ: जोव्यक्तिउक्त ऋणमोचनस्तोत्र काविधिविधानवपूर्णनिष्ठासेनियमितप्रातःकालपाठकरताहैंउसकेसमस्तप्रकारके
ऋणोंसेमुक्तिमिलजातीहैं।
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संपूर्णलेखपढनेकेलियेकृप्यागुरुत्वज्योतिषपत्रिकासितम्बर2011 काअंकपढें।
इस लेख को प्रतिलिपिसंरक्षण (Copy Protection) के कारणो से यहां संक्षिप्त
में प्रकाशित किया गया हैं।
>> गुरुत्वज्योतिष पत्रिका (सितम्बर2011)
Sep-2011

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